उत्तराखंड: जोशीमठ के अस्तित्व पर संकट का जिम्मेदार कौन? क्या कहती है वैज्ञानिकों की रिपोर्ट

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जोशीमठ: उत्तराखंड के जोशीमठ में अभी भी ‘धंसाव’ जारी है ऐसे में इस क्षेत्र में भूमि धंसाव गतिविधियों पर प्रधान मंत्री कार्यालय (पीएमओ) की उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में निरंतर भूकंपीय निगरानी की आवश्यकता पर चर्चा की गई. अधिकारियों ने कहा कि जोशीमठ पूरे इलाके की विस्तृत भू-तकनीकी जांच के साथ-साथ भूकंपीय सेंसर का उपयोग करके वास्तविक समय की भूकंपीय गतिविधि पर भी नजर रखनी होगी।

उत्तराखंड के जोशीमठ में लोग दहशत में जिंदगी बिताने के लिए मजबूर हैं. जोशीमठ के मकानों, खेतों, सड़कों, और जमीन में दरारे आ रही हैं. ये दरारें चौड़ी और गहरी होती जा रही हैं. पिछले कई महीनों से ऐसी स्थिति बनी हुई है।

उत्तराखंड के जोशीमठ में मंगलवार को दो जर्जर हो चुके होटलों को गिराए जाने से पहले विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। प्रदर्शनकारियों ने विध्वंस की कार्रवाई के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि ये स्पष्ट नहीं है कि जिन लोगों की संपत्तियों को गिराया जाना है उन्हें मुआवजा कैसे दिया जाएगा?

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बद्रीनाथ धाम के मास्टर प्लान के तहत मुआवजे की मांग को लेकर होटल मालिक और स्थानीय लोग होटलों को गिराने के सरकार के कदम का विरोध कर रहे हैं। बता दें कि ‘मलारी इन’ और ‘माउंट व्यू’ दोनों होटल अगल-बगल हैं जो एक-दूसरे की ओर झुक गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये दोनों होटल आसपास के घरों के लिए खतरा बन गए हैं।

जोशीमठ की बात करें तो यह पहाड़ के एक ढलान पर बसा हुआ है. जोशीमठ के सामने हाथी पर्वत है. इसके सामने से घाटियों से होता हुआ बद्रीनाथ के लिए रास्ता जाता है. दाईं ओर से फूलों की घाटी और हेमकुंड के लिए रास्ता जाता है. बद्रीनाथ, फूलों की घाटी और हेमकुंड जाने के लिए जोशीमठ से ही गुजरना होता है।

साल 1939 में एक वैज्ञानिक ने यह पता लगाया कि जोशीमठ एक लैंडस्लाइड पर बसा हुआ है. वह लैंडस्लाइड बहुत अस्थिर है. इसके बावजूद यहां बसावट होती रही. 7वीं शताब्दी में उत्तराखंड के कत्यूरी राजवंश ने यहां राजधानी बनाई. यहां बसावट तब से शुरू हुई. पिछले कुछ समय से आबादी बहुत ज्यादा बढ़ गई है. पहले केवल यह एक बस्ती की तरह ही था, अब यहां हजारों घर हो गए हैं. ये बहुमंजिला इमारते हैं. इन घरों को पारंपरिक शैली से नहीं बनाया गया है. ये ईंट और कंकरीट से बनाए गए हैं. भूकंप के लिहाज से यह इलाका काफी संवेदनशील है. ऐसे में ईंट और कंकरीट से घर बनाना खतरनाक है।
जानकारों की माने तो जमीन के अंदर एक बहुत बड़ी दरार (मैन सेंट्रल थ्रस्ट- MCT)जोशीमठ के ठीक नीचे से और औली के पीछे से गुजरती है. यह हेलंग से लेकर तपोवन तक है. इसके दो छोटी दरारें वैक्रता थ्रस्ट (VT) और पिंडारी थ्रस्ट (PT) गुजर रही हैं. ये दरारे प्राकृतिक हैं. यह पूरा इलाका कुदरती तौर पर बनी दरारों के ऊपर है. हिमालय पर्वत के बनने के दौरान ये दरारें बनी थीं।

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झनकारो स्थानीय लोगों की माने तो जोशीमठ के नीचे से एक लंबी सुरंग बनाई गई है. यह सुरंग वहां से शुरू होती है, जहां पिछले साल ऋषिगंगा नदी ने तबाही मचाई थी. यह सुरंग वहां से शुरू होकर हेलंग तक जाती है. इस प्रोजेक्ट के जरिए तपोवन में पानी स्टोर होगा और सुरंग के जरिए हेलंग तक पहुंचेगा. यह सुरंग करीब एक किलोमीटर की निचाई में बनाई गई है. इस सुरंग पर जमीन का पूरा दबाव है. साल 2009 में हेलंग से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर इस सुरंग में एक टनल बोरिंग मशीन फंस गई थी. इस मशीन ने जमीन के नीचे एक पानी के स्रोत को पंचर कर दिया. इसकी वजह से करीब एक महीने तक पानी रिसता रहा. यह भी कहा जा रहा है कि जोशीमठ में दरारों की एक वजह यह भी हो सकता है

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